उत्तर प्रदेश विधान मंडल की प्रथम बैठक के 133वें वर्ष पर आयोजित 'प्रयागराज गौरव अनुभूति' कार्यक्रम आयोजित, राजधानी बनाने गूंज, जाने पूरा इतिहास
चंद्रशेखर आजाद पार्क में आयोजित कार्यक्रम में विश्वनाथगंज विधायक डॉ आरके वर्मा ने प्रयागराज को प्रदेश की राजधानी बनाने की मांग की। उन्होंने कहा कि शहीद चंद्रशेखर आजाद को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उन्होंने यह मांग उस समय की जब बुधवार को अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद उद्यान परिसर स्थित पब्लिक लाइब्रेरी भवन में उत्तर प्रदेश विधान मंडल की प्रथम बैठक के 133वें वर्ष पर आयोजित 'प्रयागराज गौरव अनुभूति' कार्यक्रम आयोजित था। इस कार्यक्रम में प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और प्रदेश विधान सभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थे। उन्होंने कहा कि इससे प्रयागराज का वास्तविक राजनीतिक गौरव भी वापस आएगा।
परवेज़ आलम
संपादक प्रातःकाल एक्सप्रेस
प्रयागराज (Allahabad )भारतवर्ष का एक पौराणिक नगर है जिसे अनेक कथाएं और मिथक पल-प्रतिपल सतत ही जीवंत रखते हैं। तीर्थों के राज का मतलब प्रयागराज। लेकिन आधुनिक काल की कसौटी पर कसा जाए तो संगम की इस नगरी के लिए जनवरी महीना भी एक ऐतिहासिक संदर्भ में कम महत्वपूर्ण नहीं है। 133 वर्ष पहले 8 जनवरी, 1887 को प्रयागराज से विधायी कार्य-कलापों जो धारा प्रवाहित हुई, वह नित नए आयामों को स्पर्श कर रही है। उस वक़्त उत्तर प्रदेश नार्थ वेस्टर्न प्राविंसेज एंड अवध के नाम से जाना जाता था और तब प्रयागराज का पूर्ववर्ती नाम इलाहाबाद राज्य की राजधानी थी। दरअसल, इसकी नींव 5 जनवरी 1887 को ही पड़ गई थी जब इंडियन काउंसिल एक्ट- 1861 के तहत तत्कालीन प्रदेश में पहली विधानमंडल की स्थापना की गई थी। इसका गौरव इलाहाबाद को मिला।
दरअसल, यह वह काल था जब इलाहाबाद एक नए ऐतिहासिक संदर्भ में करवट ले रहा था। वह नगर जो अपने प्राचीन वैभव को समेटे यानी प्रयागराज के नाम से पूजित था , उस नगर में विधायी कार्यकलाप के नए अध्याय का सूत्रपात हुआ। एक नए युग का श्रीगणेश हुआ जो इस साल अपने 133वें वसंत का स्वागत कर रहा है। तत्कालीन लेजिस्लेटिव काउंसिल फ़ार द नार्थ वेस्टर्न प्राविंसेज एंड अवध के नाम से नवगठित विधानमंडल की पहली बैठक 8 जनवरी, 1887 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में संपन्न हुई। इस महत्वपूर्ण बैठक का स्थान का गवाह बना नगर का थार्नहिल मेमोरियल हाल। इस वक्त यहां से सुप्रसिद्ध पब्लिक लाइब्रेरी संचालित हो रही है। पब्लिक लाइब्रेरी भवन अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद पार्क के विशाल परिसर में स्थापित है। अपने शैशवकाल में इस विधानमंडल के केवल 9 सदस्य थे। उल्लेखनीय बात यह थी इन 9 सदस्यों में चार भारतीय जिनके नाम थे-पंडित अजोध्या नाथ, राजा प्रताप नारायण सिंह, रायबहादुर दुर्गाप्रसाद और मौलवी सैय्यद अहमद। बाक़ी सदस्यों में जे डब्ल्यू क्विंटन, टी कोनलन, जे वुडबर्न, एम ए मैकाउंगी और जी ई नाक्स। नाक्स इस सदन के सचिव थे और बैठकों की अध्यक्षता उस वक्त प्रदेश के लेफ़्टिनेंट गवर्नर करते थे। चार भारतीयों का विधानमंडल का सदस्य होना उस वक्त गौरव की बात थी। इन सदस्यों का चयन उनके मेधा व बौद्धिक स्तर को लेकर हुआ था।
बहरहाल, इलाहाबाद के प्रमुख स्थान विधानमंडल की बैठकों के गवाह बने। पहली बैठक 8 जनवरी 1887 के बाद अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद पार्क में अवस्थित थार्नहिल मेमोरियल हॉल( पब्लिक लाइब्रेरी) में 14, मेयो हाल (स्पोर्ट्स कांप्लेक्स) में 17, म्योर सेंट्रल कालेज( वर्तमान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय का विज्ञान संकाय) में 3 और गवर्नमेंट हाउस ( वर्तमान मेडिकल कॉलेज) में तीन बैठकें संपन्न हुईं। निश्चित ही प्रचार व जानकारी के अभाव में लोग नगर के ऐसे गौरवशाली योगदान के बारे में इन महत्वपूर्ण स्थलों के इतिहास के बारे में कम ही अवगत होंगे। यह मेरे लिए परम सौभाग्य की बात है कि मुझे बचपन से ही प्रयागराज का पावन व अद्भुत सानिध्य मिला। बाल्यकाल से मेरे मानसपटल पर पब्लिक लाइब्रेरी के आयोजनों को धुंधली छवि विद्यमान रही है। लेकिन अब ऐसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्यक्रमों में सीधी भागीदारी का अवसर प्राप्त हो रहा है, यह प्रयागराज का ही आशीर्वाद है। प्रसाद है। इसके प्रति मैं हमेशा ही नतमस्तक रहता हूं।
यह भी दिलचस्प है कि विधायी कार्य-कलापों के लिहाज़ से प्रयागराज और लखनऊ का समय के साथ एक विशेष नाता बना। समय के साथ इतिहास भी बदलता है। यह सर्वविदित है। इस कड़ी में प्रयागराज के विधायी कार्य-कलापों के विस्तार देते हुए और वक्त की ज़रूरत के हिसाब से बाद में उसमें लखनऊ जुड़ गया। लखनऊ की सांस्कृतिक विरासत में अध्यात्म-संस्कृति-विधायी की त्रयी महत्वपूर्ण योगदान दे रही रही है।


No comments