जानिए, क्या है एससी/एसटी ऐक्ट पूरा विवाद और किस पक्ष की है क्या दलील..सुप्रीम कोर्ट केस क्रमांक 416/ 2018 - सारांश
नई दिल्ली : अनुसूचित जाति-जनजाति ऐक्ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी पर रोक के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ सरकार ने सोमवार को पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी है। शीर्ष अदालत के इस फैसले को तमाम दलित संगठनों और कानूनी जानकारों ने यह कहते हुए दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया था कि इससे वंचित समुदाय के लोगों की आवाज कमजोर होगी। यही नहीं, तमाम दलित संगठनों ने इस फैसले के विरोध में आज देशव्यापी बंद बुलाया, जो हिंसक हो चुका है।
जानें, क्या है पूरा विवाद और किस पक्ष की है क्या दलील...
यहां से शुरू हुआ मामला
- एससी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले एक शख्स ने महाराष्ट्र के सरकारी अधिकारी सुभाष काशीनाथ महाजन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।शिकायत में महाजन पर शख्स ने अपने ऊपर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में अपने दो जूनियर एंप्लॉयीज के खिलाफ कानूनी कार्रवाई पर रोक लगाने का आरोप लगाया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि उन एंप्लॉयीज ने उन पर जातिसूचक टिप्पणी की थी।
जानें, क्या है पूरा विवाद और किस पक्ष की है क्या दलील...
यहां से शुरू हुआ मामला
- एससी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले एक शख्स ने महाराष्ट्र के सरकारी अधिकारी सुभाष काशीनाथ महाजन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।शिकायत में महाजन पर शख्स ने अपने ऊपर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में अपने दो जूनियर एंप्लॉयीज के खिलाफ कानूनी कार्रवाई पर रोक लगाने का आरोप लगाया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि उन एंप्लॉयीज ने उन पर जातिसूचक टिप्पणी की थी।
-गैर-अनुसूचित जाति के इन अधिकारियों ने उस व्यक्ति की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में उसके खिलाफ टिप्पणी की थी। जब मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारी ने अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए उनके वरिष्ठ अधिकारी से इजाजत मांगी तो इजाजत नहीं दी गई। इस पर उनके खिलाफ भी पुलिस में मामला दर्ज कर दिया गया। बचाव पक्ष का कहना है कि अगर किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति के खिलाफ ईमानदार टिप्पणी करना अपराध हो जाएगा तो इससे काम करना मुश्किल जो जाएगा।
- काशीनाथ महाजन ने एफआईआर खारिज कराने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया था, लेकिन बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इससे इनकार कर दिया था।
- इसके बाद महाजन ने हाई कोर्ट के फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी। इस पर शीर्ष अदालत ने उन पर एफआईआर हटाने का आदेश देते हुए अनुसूचित जाति/जनजाति ऐक्ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी पर रोक का आदेश दिया था। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत को भी मंजूरी दे दी थी
- इस फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। दलित संगठनों और कई राजनीतिक दलों की ओर से केंद्र सरकार से इस मसले पर अपना रुख स्पष्ट करने की मांग की गई। इसके बाद सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की ओर से कहा गया कि सरकार इस मसले पर पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगी।
क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला
- इस फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। दलित संगठनों और कई राजनीतिक दलों की ओर से केंद्र सरकार से इस मसले पर अपना रुख स्पष्ट करने की मांग की गई। इसके बाद सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की ओर से कहा गया कि सरकार इस मसले पर पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगी।
क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए एससी/एसटी ऐक्ट में तत्काल गिरफ्तारी न किए जाने का आदेश दिया था। इसके अलावा एससी/एसटी ऐक्ट के तहत दर्ज होने वाले केसों में अग्रिम जमानत को भी मंजूरी दी थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस कानून के तहत दर्ज मामलों में ऑटोमेटिक गिरफ्तारी की बजाय पुलिस को 7 दिन के भीतर जांच करनी चाहिए और फिर आगे ऐक्शन लेना चाहिए। यही नहीं शीर्ष अदालत ने कहा था कि सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी अपॉइंटिंग अथॉरिटी की मंजूरी के बिना नहीं की जा सकती। गैर-सरकारी कर्मी की गिरफ्तारी के लिए एसएसपी की मंजूरी जरूरी होगी।
कांग्रेस और एनडीए के सहयोगियों ने की रिव्यू पिटिशन दाखिल करने की मांग
बता दें कि कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष के अलावा एनडीए के दलित और पिछड़े वर्ग से आने वाले जनप्रतिनिधियों ने भी मोदी सरकार से रिव्यू पिटिशन दाखिल करने की मांग की थी। इसके अलावा एनडीए के कुछ सहयोगी दलों ने भी नाखुशी जाहिर की थी।
क्या है दलित संगठनों की राय
दलित संगठनों का कहना है कि इससे 1989 का अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम कमजोर पड़ जाएगा। इस ऐक्ट के सेक्शन 18 के तहत ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है। ऐसे में यह छूट दी जाती है तो फिर अपराधियों के लिए बच निकलना आसान हो जाएगा। इसके अलावा सरकारी अफसरों के खिलाफ केस में अपॉइंटिंग अथॉरिटी की मंजूरी को लेकर भी दलित संगठनों का कहना है कि उसमें भी भेदभाव किया जा सकता है।
कांग्रेस और एनडीए के सहयोगियों ने की रिव्यू पिटिशन दाखिल करने की मांग
बता दें कि कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष के अलावा एनडीए के दलित और पिछड़े वर्ग से आने वाले जनप्रतिनिधियों ने भी मोदी सरकार से रिव्यू पिटिशन दाखिल करने की मांग की थी। इसके अलावा एनडीए के कुछ सहयोगी दलों ने भी नाखुशी जाहिर की थी।
क्या है दलित संगठनों की राय
दलित संगठनों का कहना है कि इससे 1989 का अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम कमजोर पड़ जाएगा। इस ऐक्ट के सेक्शन 18 के तहत ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है। ऐसे में यह छूट दी जाती है तो फिर अपराधियों के लिए बच निकलना आसान हो जाएगा। इसके अलावा सरकारी अफसरों के खिलाफ केस में अपॉइंटिंग अथॉरिटी की मंजूरी को लेकर भी दलित संगठनों का कहना है कि उसमें भी भेदभाव किया जा सकता है।
क्या कहते हैं सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन करने वाले
शीर्ष अदालत के इस फैसले का पक्ष लेने वालों का कहना है कि इससे इस ऐक्ट के दुरुपयोग को कम किया जा सकेगा। इसके अलावा निर्दोष लोग कानूनी पेचीदगी में पड़ने से बचेंगे। हालांकि कानूनी जानकारों की राय इस पर बंटी हुई है।
पुनर्विचार के लिए सरकार ने तैयार किए तर्क
सरकारी सूत्रों ने बताया कि सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्रालय द्वारा दाखिल किए जाने वाली इस याचिका में यह तर्क दिया जा सकता है कि कोर्ट के फैसले से एससी और एसटी ऐक्ट 1989 के प्रावधान कमजोर हो जाएंगे। याचिका में सरकार यह भी तर्क दे सकती है कि कोर्ट के मौजूदा आदेश से लोगों में कानून का भय खत्म होगा और इस मामले में और ज्यादा कानून का उल्लंघन हो सकता है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी ऐक्ट के बेजा इस्तेमाल पर चिंता जताते हुए इसके तहत दर्ज मामलों में तत्काल गिरफ्तारी न किए जाने का आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट केस क्रमांक 416/ 2018 - सारांश*
गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ फार्मेसी कार्ड्स के एक एससी एसटी जाति के स्टोर केपर की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में उनके सीनियर ने विपरीत टिप्पणी दर्ज की। स्टोर कीपर ने उनके विरुद्ध एससी एसटी एट्रोसिटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज किया गया पुलिस में। पुलिस ने उन अधिकारियों को गिरफ्तार करने के लिए निर्देशक ऑफ टैक्निकल एजुकेशन से अनुमति मांगी जिसे मंजूर नहीं किया गया था इसके करीब 5 साल बाद उक्त स्टोर केपर ने निर्देशक तकनीकी शिक्षा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की। (पेज 3, 4) डायरेक्टर ने अग्रिम जमानत के लिए न्यायालय में याचिका पेश की थी जिस पर केस सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
एट्रोसिटी एक्ट में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध होने वाले कृत्यों को अपराध माना जाता है I जैसे, उनका सामाजिक बहिष्कार करना, जानबूझ कर उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित या पीड़ित करना, आदि।
विवाद का विषय यह है कि इस अधिनियम की धारा 18 अनुसार, यदि इस अधिनियम के तहत अगर किसी के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की जाती है तो उसे अग्रिम जमानत नहीं मिल सकता है। इसका भी अर्थ निकाला गया है कि अगर किसी भी प्रकार के दोष के लिए उसे प्राथमिकी दर्ज कर गिरफ्तार करना है तो भी बाद में कोर्ट में केस झूठा साबित हो जाएंगे पहले उसे जेल जाना होगा।
विडंबना ये है कि लूट, डकैति, बलात्कार, हत्या जैसे आरोपों में भी अग्रिम जमानत मिल सकता है पर एट्र्रोसिटी अधिनियम के तहत नहीं। (फैसले का पेज 15 और 24) बड़ी संख्या में केस विशेष रूप से सरकारी और अर्धशासकीय सेवकों के विरुद्ध व्यक्तिगत स्वर्थवश फ़ाइल किए गए हैं।
राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्डस ब्यूरो, मंत्रालय ऑफ होम अफेरर्स डेटा (क्राइम इन इंडिया 2016- सांख्यिकी) के अनुसार 2016 में एससी केसेस में 5347 केस और एसटी के 9 12 मामले झूठे पाए गए। साल 2015 में 15638 से 11024 केसेस में आरोप मुक्त कर दिए गए, 495 केस वापस ले गए (पृष्ठ 30)। वर्ष 2015 में कोर्ट द्वारा निष्पादित केस में से 75% से अधिक मामलों में या तो आरोप सिद्ध नहीं हो या केस वापस ले जाए (पृष्ठ 33)।
कोर्ट ने कहा कि सामाजिक न्याय के लिए यह अधिनियम का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। यह व्यकितगत शत्रुता के कारण बदला लेने या ब्लैकमेल करने का हथियार बनना नहीं देना चाहिए। (पृष्ठ 25)। कानून निरपराध को बचाने और दोषी को दंड देना है अतः यदि किसी को कोई अपराध नहीं किया गया तो सिर्फ किसी का आरोप लगाएगा से सेक्शन 18 के तहत अग्रिम जमानत ना देना उचित नहीं है। इस तरह से स्वतंत्रता का मूल संवैधानिक अधिकार का अभिशापन होगा यदि ऐसा नहीं हुआ तो शासकीय सेवकों का कार्य निष्पादन कठिन होगा सामान्य नागरिक को भी इस अधिनियम के तहत गलत केस में फंसा देने के धमकी देकर काले मेल हो सकते हैं। (पृष्ठ 67)
अंततः कोर्ट ने कहा कि एट्र्रोसिटी एक्ट के केस में अग्रिम जमानत पर कोई रोक नहीं है अगर पहली बार देखा गया मामला दुर्भावनापूर्ण फ़ाइल हो। निरपेक्ष नागरिकों को गलत आरोपों से दुष्प्रभाव से बचाने के लिए डीएसपी द्वारा समयबद्ध प्राथमिक जांच की जानी चाहिए और केस रजिस्ट्री होने के बाद भी गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं है। इस अधिनियम की हो रही दुरूपयोग के मुद्दे पर सरकारी अधिकारियों को बिना नियुक्त करने वाले अधिकारियों की अनुमति के लिए गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। गैर सरकारी अधिकारियों के केस में जिले के वरिष्ठ पुलिस सुपरिंटेंडेंट की अनुमति आवश्यक है (पृष्ठ 86 87)।


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