दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग का अभिप्राय:
दिल्ली की वर्तमान आम आदमी पार्टी सरकार ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग की है। इससे पूर्व यह मांग भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने भी की थी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि केन्द्र के अलोकतांत्रिक रवैया से एक चुनी हुई सरकार को काम करने से रोका जा रहा है। आइये समझें कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग क्यों की जा रही है।
संदीप शुक्ल
वरिष्ठ संवाददाता
दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग का अभिप्राय:
दिल्ली की वर्तमान आम आदमी पार्टी सरकार ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग की है। इससे पूर्व यह मांग भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने भी की थी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि केन्द्र के अलोकतांत्रिक रवैया से एक चुनी हुई सरकार को काम करने से रोका जा रहा है। आइये समझें कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग क्यों की जा रही है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात दिल्ली की स्थिति:
आजादी के बाद जो देश की पहली सरकार बनी, उसने देश भर के राज्यों को चार श्रेणियों में बांटा था। दिल्ली को तब ‘सी’ श्रेणी में रखा गया था। इस श्रेणी के राज्यों का मुखिया एक चीफ कमिश्नर होता था।
राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर 1956 में दिल्ली को राज्यों की श्रेणी से हटा दिया गया। इससे दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश बन गई और इसकी विधानसभा समाप्त हो गई और इसके स्थान पर म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन (डीएमसी) का गठन कर दिया गया।
कुछ साल बाद इस व्यवस्था में भी बदलाव किये गए. 1966 में ‘दिल्ली प्रशासन कानून - 1966’ लागू कर दिया गया। इसके अंतर्गत दिल्ली में मेट्रोपोलिटन काउंसिल की व्यवस्था की गई। नवम्बर 1966 को दिल्ली का पहला उपराज्यपाल नियुक्त किया गया।
1987 में भारत सरकार ने सरकारिया समिति का गठन किया। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर 1991 में 69वां संविधान संशोधन किया गया। इसके द्वारा एक बार फिर से काउंसिल की जगह दिल्ली विधानसभा को स्थापित कर दिया गया।
1991 में हुए इस संशोधन से दिल्ली को ‘केंद्र शासित प्रदेश’ के स्थान पर ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र’ घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी (एनसीटी) ऑफ दिल्ली एक्ट 1991 के जरिए दिल्ली में विधानसभा गठन को भी मंजूरी दे दी गई।
संवैधानिक स्थिति:
भारतीय संविधान के अनुछेद 239 में केंद्र शासित प्रदेशों में ‘प्रशासक’ की व्यवस्था की बात कही गई है। इसे अंडमान-निकोबार, पुडुचेरी और दिल्ली में उपराज्यपाल कहा जाता है। 1991 में हुए संशोधन ने संविधान में अनुच्छेद 239 एए और 239 एबी भी जोड़ दिए गए थे।
अनुच्छेद 239 एए की उपधारा 3 (ए) के अनुसार दिल्ली विधानसभा राज्य सूची या समवर्ती सूची में मौजूद किसी भी विषय पर कानून बना सकती है लेकिन उसे कानून-व्यवस्था, पुलिस और जमीन से संबंधित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार नहीं है।
इस उपधारा में यह भी लिखा है कि दिल्ली विधानसभा केवल उस सीमा तक ही किसी विषय पर कानून बना सकती है जिस सीमा तक वह विषय किसी केंद्र शासित राज्य पर लागू होता हो। इस वजह से पूरी तरह से केंद्र प्रशासित न होते हुए भी राज्य सूची के वे मामले भी दिल्ली विधानसभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो गए जो केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू नहीं होते।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात दिल्ली की स्थिति:
आजादी के बाद जो देश की पहली सरकार बनी, उसने देश भर के राज्यों को चार श्रेणियों में बांटा था। दिल्ली को तब ‘सी’ श्रेणी में रखा गया था। इस श्रेणी के राज्यों का मुखिया एक चीफ कमिश्नर होता था।
राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर 1956 में दिल्ली को राज्यों की श्रेणी से हटा दिया गया। इससे दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश बन गई और इसकी विधानसभा समाप्त हो गई और इसके स्थान पर म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन (डीएमसी) का गठन कर दिया गया।
कुछ साल बाद इस व्यवस्था में भी बदलाव किये गए. 1966 में ‘दिल्ली प्रशासन कानून - 1966’ लागू कर दिया गया। इसके अंतर्गत दिल्ली में मेट्रोपोलिटन काउंसिल की व्यवस्था की गई। नवम्बर 1966 को दिल्ली का पहला उपराज्यपाल नियुक्त किया गया।
1987 में भारत सरकार ने सरकारिया समिति का गठन किया। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर 1991 में 69वां संविधान संशोधन किया गया। इसके द्वारा एक बार फिर से काउंसिल की जगह दिल्ली विधानसभा को स्थापित कर दिया गया।
1991 में हुए इस संशोधन से दिल्ली को ‘केंद्र शासित प्रदेश’ के स्थान पर ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र’ घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी (एनसीटी) ऑफ दिल्ली एक्ट 1991 के जरिए दिल्ली में विधानसभा गठन को भी मंजूरी दे दी गई।
संवैधानिक स्थिति:
भारतीय संविधान के अनुछेद 239 में केंद्र शासित प्रदेशों में ‘प्रशासक’ की व्यवस्था की बात कही गई है। इसे अंडमान-निकोबार, पुडुचेरी और दिल्ली में उपराज्यपाल कहा जाता है। 1991 में हुए संशोधन ने संविधान में अनुच्छेद 239 एए और 239 एबी भी जोड़ दिए गए थे।
अनुच्छेद 239 एए की उपधारा 3 (ए) के अनुसार दिल्ली विधानसभा राज्य सूची या समवर्ती सूची में मौजूद किसी भी विषय पर कानून बना सकती है लेकिन उसे कानून-व्यवस्था, पुलिस और जमीन से संबंधित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार नहीं है।
इस उपधारा में यह भी लिखा है कि दिल्ली विधानसभा केवल उस सीमा तक ही किसी विषय पर कानून बना सकती है जिस सीमा तक वह विषय किसी केंद्र शासित राज्य पर लागू होता हो। इस वजह से पूरी तरह से केंद्र प्रशासित न होते हुए भी राज्य सूची के वे मामले भी दिल्ली विधानसभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो गए जो केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू नहीं होते।
संदीप शुक्ल
वरिष्ठ संवाददाता
दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग का अभिप्राय:
दिल्ली की वर्तमान आम आदमी पार्टी सरकार ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग की है। इससे पूर्व यह मांग भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने भी की थी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि केन्द्र के अलोकतांत्रिक रवैया से एक चुनी हुई सरकार को काम करने से रोका जा रहा है। आइये समझें कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग क्यों की जा रही है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात दिल्ली की स्थिति:
आजादी के बाद जो देश की पहली सरकार बनी, उसने देश भर के राज्यों को चार श्रेणियों में बांटा था। दिल्ली को तब ‘सी’ श्रेणी में रखा गया था। इस श्रेणी के राज्यों का मुखिया एक चीफ कमिश्नर होता था।
राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर 1956 में दिल्ली को राज्यों की श्रेणी से हटा दिया गया। इससे दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश बन गई और इसकी विधानसभा समाप्त हो गई और इसके स्थान पर म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन (डीएमसी) का गठन कर दिया गया।
कुछ साल बाद इस व्यवस्था में भी बदलाव किये गए. 1966 में ‘दिल्ली प्रशासन कानून - 1966’ लागू कर दिया गया। इसके अंतर्गत दिल्ली में मेट्रोपोलिटन काउंसिल की व्यवस्था की गई। नवम्बर 1966 को दिल्ली का पहला उपराज्यपाल नियुक्त किया गया।
1987 में भारत सरकार ने सरकारिया समिति का गठन किया। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर 1991 में 69वां संविधान संशोधन किया गया। इसके द्वारा एक बार फिर से काउंसिल की जगह दिल्ली विधानसभा को स्थापित कर दिया गया।
1991 में हुए इस संशोधन से दिल्ली को ‘केंद्र शासित प्रदेश’ के स्थान पर ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र’ घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी (एनसीटी) ऑफ दिल्ली एक्ट 1991 के जरिए दिल्ली में विधानसभा गठन को भी मंजूरी दे दी गई।
संवैधानिक स्थिति:
भारतीय संविधान के अनुछेद 239 में केंद्र शासित प्रदेशों में ‘प्रशासक’ की व्यवस्था की बात कही गई है। इसे अंडमान-निकोबार, पुडुचेरी और दिल्ली में उपराज्यपाल कहा जाता है। 1991 में हुए संशोधन ने संविधान में अनुच्छेद 239 एए और 239 एबी भी जोड़ दिए गए थे।
अनुच्छेद 239 एए की उपधारा 3 (ए) के अनुसार दिल्ली विधानसभा राज्य सूची या समवर्ती सूची में मौजूद किसी भी विषय पर कानून बना सकती है लेकिन उसे कानून-व्यवस्था, पुलिस और जमीन से संबंधित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार नहीं है।
इस उपधारा में यह भी लिखा है कि दिल्ली विधानसभा केवल उस सीमा तक ही किसी विषय पर कानून बना सकती है जिस सीमा तक वह विषय किसी केंद्र शासित राज्य पर लागू होता हो। इस वजह से पूरी तरह से केंद्र प्रशासित न होते हुए भी राज्य सूची के वे मामले भी दिल्ली विधानसभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो गए जो केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू नहीं होते।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात दिल्ली की स्थिति:
आजादी के बाद जो देश की पहली सरकार बनी, उसने देश भर के राज्यों को चार श्रेणियों में बांटा था। दिल्ली को तब ‘सी’ श्रेणी में रखा गया था। इस श्रेणी के राज्यों का मुखिया एक चीफ कमिश्नर होता था।
राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर 1956 में दिल्ली को राज्यों की श्रेणी से हटा दिया गया। इससे दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश बन गई और इसकी विधानसभा समाप्त हो गई और इसके स्थान पर म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन (डीएमसी) का गठन कर दिया गया।
कुछ साल बाद इस व्यवस्था में भी बदलाव किये गए. 1966 में ‘दिल्ली प्रशासन कानून - 1966’ लागू कर दिया गया। इसके अंतर्गत दिल्ली में मेट्रोपोलिटन काउंसिल की व्यवस्था की गई। नवम्बर 1966 को दिल्ली का पहला उपराज्यपाल नियुक्त किया गया।
1987 में भारत सरकार ने सरकारिया समिति का गठन किया। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर 1991 में 69वां संविधान संशोधन किया गया। इसके द्वारा एक बार फिर से काउंसिल की जगह दिल्ली विधानसभा को स्थापित कर दिया गया।
1991 में हुए इस संशोधन से दिल्ली को ‘केंद्र शासित प्रदेश’ के स्थान पर ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र’ घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी (एनसीटी) ऑफ दिल्ली एक्ट 1991 के जरिए दिल्ली में विधानसभा गठन को भी मंजूरी दे दी गई।
संवैधानिक स्थिति:
भारतीय संविधान के अनुछेद 239 में केंद्र शासित प्रदेशों में ‘प्रशासक’ की व्यवस्था की बात कही गई है। इसे अंडमान-निकोबार, पुडुचेरी और दिल्ली में उपराज्यपाल कहा जाता है। 1991 में हुए संशोधन ने संविधान में अनुच्छेद 239 एए और 239 एबी भी जोड़ दिए गए थे।
अनुच्छेद 239 एए की उपधारा 3 (ए) के अनुसार दिल्ली विधानसभा राज्य सूची या समवर्ती सूची में मौजूद किसी भी विषय पर कानून बना सकती है लेकिन उसे कानून-व्यवस्था, पुलिस और जमीन से संबंधित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार नहीं है।
इस उपधारा में यह भी लिखा है कि दिल्ली विधानसभा केवल उस सीमा तक ही किसी विषय पर कानून बना सकती है जिस सीमा तक वह विषय किसी केंद्र शासित राज्य पर लागू होता हो। इस वजह से पूरी तरह से केंद्र प्रशासित न होते हुए भी राज्य सूची के वे मामले भी दिल्ली विधानसभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो गए जो केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू नहीं होते।


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