भावाभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है सिनेमा- प्रो. बिसारिया
प्रातःकाल संवाददाता। सिनेमा में साहित्य, नृत्य और मनोरंजन का गठजोड़ होता है। किसी साहित्यिक कृति पर आधारित फिल्म की असफलता को लेकर लेखक और निर्देशक की निराशा के पीछे दोनों की अपनी अहंकारी कर्मपद्धति होती है। निर्देशक को तीन घंटे के अंदर सभी बातों को समेटना होता है, तो स्वाभाविक है कि पूरी तरह साहित्य पर आधारित फिल्में नहीं बनाई जा सकतीं। सिनेमा भावाभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम होता है। साहित्यकार को भी फिल्म के माध्यम का ज्ञान होना नितांत आवश्यक है।
यह बातें बीएचयू स्थित कला संकाय के प्रेमचंद सभागार में प्रो. वासुदेव सिंह स्मृति न्यास और हिन्दी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में प्रो. वासुदेव सिंह की पुण्यतिथि पर आयोजित "साहित्य और सिनेमा का अन्तर्सम्बन्ध" विषयक विचार-गोष्ठी में बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रो. पुनीत बिसारिया ने मुख्य अतिथि पद से कहीं। उन्होंने आगे कहा कि हमारी अपनी पसंद-नापसंद हो सकती है, लेकिन किसी फिल्म का विरोध न्यायसंगत नहीं। अगर ऐसी स्थिति फिल्म निर्देशक के सामने होगी, तो वह अवश्य ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित फिल्म बनाने से डरेगा।
अध्यक्षीय उद्बोधन में हिन्दी विभाग की अध्यक्ष प्रो. रामकली सराफ ने कहा कि साहित्य के अनुसार ही सिनेमा चले, यह संभव नहीं है। सिनेमा व्यक्ति के भाव और विचार को उन्नत बनाकर यथार्थ से परिचित कराता है। वैश्विक दौर में सिनेमा साहित्य से कट गया है। यदि हम संस्कृति को नहीं बचा सके, तो निश्चित है कि आर्थिक और सामाजिक स्थिति को विघटित होने से नहीं बचा सकेंगे।
उ. प्र. माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड के सदस्य डॉ. हरेन्द्र राय ने विशिष्ट अतिथि के रूप में कहा कि शिक्षक होकर अपने विद्यार्थियों के हृदय में उतर जाने की अद्भुत क्षमता प्रो. वासुदेव सिंह में थी। विद्यार्थी के लिए जब शिक्षक द्रवित होने लगे, तभी वह सही मायने में शिक्षक होगा। पत्रकारिता विभाग के प्रो. अनुराग दवे ने कहा कि सिनेमा कला का छठाँ रूप है। साहित्य जिस तरह हमें कल्पना लोक में ले जाता है, उसी तरह फिल्म निर्देशक तकनीक के माध्यम से उसका चित्रण करते हुए यथार्थ से परिचित कराने की कोशिश करता है। प्रो. आशीष त्रिपाठी ने कहा कि सिनेमा एक विशिष्ट कृति है। यह दुनिया की सबसे नमी कला है। यह पूरी तरह आधुनिक है।
डॉ. प्रभाकर सिंह ने विषय प्रवर्तन में कहा कि साहित्य और सिनेमा कलात्मक विधाएँ हैं। सिनेमा साहित्य के शिष्य जैसा है। यह सांस्कृतिक चेतना के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ताने-बाने में प्रवेश कर चुका है। बावजूद इसके, साहित्य और सिनेमा की शुरूआत मनोरंजन से हुई है। गोष्ठी में डा. बृजेन्द्र पाण्डे और मुकेश यादव ने प्रो. वासुदेव सिंह के विकास।व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। न्यास के सचिव डॉ. हिमांशु शेखर सिंह ने स्वागत, प्रो. सुमन जैन ने संचालन तथा प्रो. श्रद्धा सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया। प्रो. अवधेश प्रधान, प्रो. रोयाना सिंह, डॉ. एन. के. सिंह, डॉ. सीमा तिवारी, डॉ. अनुराधा सिंह, आचार्य नरेन्द्र सिंह, श्रीमती प्रेमलता सिंह, आरती सिंह, डॉ. तरुण द्विवेदी सहित अनेक प्राध्यापक, शोध छात्र एवं विद्यार्थियों की प्रमुख उपस्थिति रही।
कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा महामना मालवीय तथा प्रो. वासुदेव सिंह के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। विश्वविद्यालय की छात्रा ज्योति और आराधना द्वारा कुलगीत गायन किया गया।



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