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संस्कृति कुम्भ : देश के धार्मिक, लोकनृत्यों, आंचलिक लोकनृत्यों एवं लोकगायन की मनोहारी प्रस्तुति


प्रातःकाल संवाददाता,प्रयागराज, 09 फरवरी। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार एवं उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र द्वारा संस्कृति कुम्भ के अन्तर्गत आयोजित होने वाले कार्यक्रमों के तहत सांस्कृतिक केन्द्र के शिल्पहाट में लोकशिल्पों की प्रदर्शनी के साथ-साथ देश के धार्मिक, लोकनृत्यों, आंचलिक लोकनृत्यों एवं लोकगायन की मनोहारी प्रस्तुतियाँ सम्पन्न हुई। 

संस्कृति कुम्भ के अन्तर्गत शिल्पहाट के मुक्ताकाशी मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का शुभारम्भ संगीता मिश्रा के लोकगायन से हुआ। गंगा को समर्पित गीतों ने उपस्थित दर्शकों को गंगा महिमा से अवगत कराया। दिल्ली की कविता द्विवेदी ने शास्त्रीय नृत्य कथक के माध्यम से गंगा स्तुति एवं संगम की महिमा का बखान किया। छत्तीसगढ़ के मिलाप दास बंजारे एवं दल का पंथी नृत्य अत्यन्त प्रभावी था। गुरू घासीदास के आध्यात्मिक पदों पर आधारित यह नृत्य घासीदास के अनुयाइयों का आनुष्ठानिक नृत्य होने के साथ-साथ उनकी जीवन प्रणाली को ओजस्वी रूप देने वाला एक परम्परागत नृत्य है। धीमी एवं तीव्र गति का यह नृत्य अपने चरम पर पहुँचने पर रोमांच पैदा करता है। उपस्थित दर्शकों ने करतल ध्वनि से कलाकारों का उत्साह बढ़ाया। छत्तीसगढ़ का ही राउतनाचा लोकनृत्य, कश्मीर की युवतियों का परम्परागत रूफ नृत्य ने भी उपस्थित दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। 

दिल्ली की कविता द्विवेदी द्वारा लखनऊ घराने के कथक के माध्यम से गंगा अवतरण एवं प्रयाग महिमा को इस शास्त्रीय नृत्य शैली के द्वारा मंचीय अभिव्यक्ति दी। निजामाबाद से पधारे शाने आलम का कव्वाली गायन ने भी दर्शकों का मनोरंजन किया। श्री आलम द्वारा हम सब का मालिक एक है, अमीर खुसरों का कलाम बहुत कठिन है डगर पनघट की-कैसे मैं भर लाऊँ जमुना से मटकी तथा छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाय केका गायन कर उपस्थित दर्शकों से संवाद बनाया। 

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