इस्लामी कानून के तहत निकाह को हाईकोर्ट ने ठहराया अवैध
इस्लामी कानून के तहत निकाह करने वाली मुस्लिम युवती को व्यस्क होने तक पति के साथ रहने का अधिकार नहीं है, सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर मसले पर सुनवाई को राजी हो गया है। युवती ने अपनी मर्जी से पसंद के लड़के के साथ शादी की थी। अहम बात है कि हाईकोर्ट ने न केवल इस निकाह को अवैध ठहरा दिया बल्कि युवती को नारी निकेतन में रखने के निर्णय को भी सही ठहराया।


खास बातें
उत्तर प्रदेश के बहराइच की रहने वाली 16 वर्षीय फातीमा ने गत 22 जून को अपनी मर्जी के साथ एक मुस्लिम युवक के साथ निकाह किया था। इस जोड़े ने मुस्लिम कानून के तहत निकाह के तमाम शर्तों को पूरा किया था। इसके बाद युवती के पिता की शिकायत पर लड़के के खिलाफ अपरहरण सहित अन्य अपराधों के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। मजिस्ट्रेट के समक्ष अपनी मर्जी के साथ निकाह करने व उसके साथ रहने की इच्छा के बावजूद उसे व्यस्क होने तक नारी निकेतन भेज दिया गया। इसके बाद उसके पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में हैबियस कॉरपस याचिका दायर की, लेकिन वह खारिज हो गई। हाईकोर्ट ने युवती को नारी निकेतन में रखने के तो फैसले को तो सही ठहराया ही बल्कि शादी को भी शून्य करार दिया।
वकील दुष्यंत पराशर के माध्यम से दायर इस मुस्लिम नाबालिग युवती ने नारी निकेतन में भेजने व निकाह को शून्य करार देने के फैसले को चुनौती दी है। याचिका में कहा गया कि मुस्लिम कानून के तहत, रजोस्वला की उम्र (15 वर्ष) की युवती को अपनी मर्जी से निकाह करने का अधिकार है। युवती के मुताबिक, निकाह की तमाम शर्तों को पूरा करने के बाद भी उसे पति के साथ रहने की इजाजत न देना और शादी को शून्य करार देना, गैरकानूनी है। युवती ने कहा है वह अपने पति के साथ रहना चाहती है तो उसे ऐसा करने से महरूम कैसे रखा जा सकता है।
वकील दुष्यंत पराशर के माध्यम से दायर इस मुस्लिम नाबालिग युवती ने नारी निकेतन में भेजने व निकाह को शून्य करार देने के फैसले को चुनौती दी है। याचिका में कहा गया कि मुस्लिम कानून के तहत, रजोस्वला की उम्र (15 वर्ष) की युवती को अपनी मर्जी से निकाह करने का अधिकार है। युवती के मुताबिक, निकाह की तमाम शर्तों को पूरा करने के बाद भी उसे पति के साथ रहने की इजाजत न देना और शादी को शून्य करार देना, गैरकानूनी है। युवती ने कहा है वह अपने पति के साथ रहना चाहती है तो उसे ऐसा करने से महरूम कैसे रखा जा सकता है।

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