Breaking News

जामिया में “मैपिंग जेंडर डायनॉमिक्स ड्यूरिंग पैन्डेमिक टाइम्स” विषय वेबीनार आयोजित, मशहूर हस्तियों ने किया शिरकत

नई दिल्ली। जामिया मिल्लिया इस्लामिया में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा निर्देशित यूजीसी और सरोजिनी नायडू महिला अध्ययन केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में 2 जुलाई को “मैपिंग जेंडर डायनॉमिक्स ड्यूरिंग पैन्डेमिक टाइम्स” विषय पर एक दिवसीय वेबीनार का आयोजन किया गया। वेबीनार में फिल्म, साहित्य और एकेडेमिक जगत की मशहूर हस्तियों ने शिरकत किया और छात्रों के साथ अपने विचार साझा किए। वेबीनार की शुरुआत में सेंटर की डायरेक्टर प्रोफेसर सबीहा हुसैन ने वेलकम स्पीच और वेबीनार के विषय का परिचय करवाया साथ ही उन्होंने वक्ताओं का परिचय भी करवाया। 
वेबीनार के पहले सत्र में बिहार के मुंगेर यूनिवर्सिटी की प्रोवीसी प्रो. कुसुम कुमारी ने कोरोना काल में महिलाओं की वर्तमान स्थिति और भविष्य में होने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में महिलाओं पर शारीरिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा है। इसके अलावा महिलाओं पर घरेलू कार्यों का दोहरा-भार भी आया है। उन्होंने महिलाओं की स्थिति पर वाकया सुनाते हुए कहा कि कोरोना काल से पहले भी महिलाओं के लिए घर लॉक डाउन जैसे ही होते थे। महिलाएं जब शादी करके आती थी तो घरों की चहारदीवारी के अंदर ही सिमटी रहती थीं। कुसुम कुमारी ने लॉक डाउन के अनुभवों पर कहा कि उन्हें ऐसा लगता था कि वह वह अपने पुराने जमाने में लौट गई हैं। 
     उन्होंने कहा कि आज भी देश में 75 फीसदी महिलाएं घरों में कैद रहने को मजबूर रहती हैं। मुट्ठी भर महिलाएं ही अपने भविष्य के लिए कुछ फैसले ले पाती हैं। उन्होंने इन परिस्थियों पर कहा कि इससे हतोत्साहित होने की जरूरत नहीं है, बल्कि समाज में अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की जरूरत है। उन्होंने हरिवंश राय बच्चन की कविता “अभी कहाँ आराम बदा, यह मूक निमंत्रण छलना है, अरे अभी तो मीलों मुझको, मीलों मुझको चलना है” को सभी महिलाओं के लिए सूत्रवाक्य करार दिया। वेबिनार में उन्होंने आशापूर्णा देवी, महादेवी वर्मा, उमा सचदेव, चित्रा मुद्गल और तस्लीमा नसरीन के कार्यों का उल्लेख किया। कुसुम कुमारी ने समाज के पितृसत्तात्मक ढांचे और उसके महिलाओं पर पड़ने वाले पर प्रभावों पर भी चर्चा की। उन्होंने क्षैतिज और उर्ध्वाधर गैरबराबरी के महिलाओं पर प्रभावों का भी विश्लेषण किया। उन्होंने महिलाओं और युवतियों से अपील किया कि वह बगैर किसी भय के अपना कार्य करती रहें। 

वेबीनार में बीएचयू समाजशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अजीत कुमार पांडेय ने समाजशास्त्रीय सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए बॉडी पावर रिलेशनशिप पर चर्चा की। उन्होंने मार्क्स, वेबर और गोफमैन के सिद्धांतों पर भी प्रकाश डाला। इसके इलावा उन्होंने मिशेल फूको के “सेक्सुआलिटी” और जुडिथ बटलर के “जेंडर परफॉर्मेटिविटी” पर किए गए कार्यों का भी उल्लेख किया। वहीं उन्होंने महिला अध्ययन के क्षेत्र में तमाम बाइनरीज का भी विश्लेषण किया। 

वेबीनार में समा वुमेन्स हेल्थ की डायरेक्टर डॉ. सरोजिनी ने लॉकडाउन के दौरान महिलाओं द्वारा सामना किए गए चुनौतियों और समस्याओं पर विस्तार से चर्चा की। साथ ही उन्होंने महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य का अधिकार देश के सभी नागरिकों का अधिकार है, लेकिन यहां महिलाओं के हेल्थ से जुड़े मुद्दों पर बात नहीं होती है। उन्हें पूरी तरह से सिस्टम से साइडलाइन कर दिया जाता है। सरकार और प्रशासनिक तंत्र महिलाओं के मुद्दों पर ज्यादा गंभीर नजर नहीं आते हैं। उन्होंने कहा कि स्वायत्त संस्था और एनजीओ ने शिक्षा, रोजगार, हेल्थ और अधिकारों पर बेहतर काम किया गया है, जिससे महिलाओं की स्थिति में सुधार हो रहा है। 

वेबीनार में फिल्म डायरेक्टर अविनाश दास ने सिनेमा के काव्यात्मत प्रभाव का विश्लेषण किया। उन्होंने 60 और 70 के दशक के सिनेमा की तुलना वर्तमान भारतीय सिनेमा से करते हुए कहा कि आज सिनेमा सिर्फ एक इवेंट बनकर रह गया है। जबकि पुराने दौर का सिनेमा काव्यात्मक संसार का सिनेमा था, जहां सेल्यूलाइड पर फिल्म नहीं बल्कि कविताएं रची जाती थीं। दास ने सिनेमा पर कॉरपोरेट कल्चर के पड़ने वाले प्रभावों पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट आज सिनेमा पर हावी है। वह सिनेमा और संगीत को प्रभावित करते हैं। उन्होंने कहा कि आज भारतीय सिनेमा के काव्यात्मक लय को बचाने की चुनौती हमारे सामने है। अनारकली ऑफ आरा के डायरेक्टर ने आगे कहा कि समाज और सिनेमा का दौर बदल रहा है। फिल्म “मुगल-ए-आज़म” की अनारकली उस दौर में हार गई थी, लेकिन आज आरा की अनारकली जीतती है। 

वहीं वेबीनार में द-केयर की फाउंडर स्वर्णिमा भट्टाचार्या ने कोराना महामारी और लॉकडाउन के दौरान महिलाओं की मानसिक स्थिति पर अपने विचार रखे। उन्होंने उदाहरण और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) डाटा प्रदर्शित कर बताया कि कोरोना काल में महिलाएं और ज्यादा प्रभावित हुई हैं और उनकी स्थिति पहले से ज्यादा खराब हुई है। उन्होंने सुझाव दिया कि समाज को महामारी काल में जेंडर के नजरिए से देखा जाना चाहिए साथ ही हेल्थ और सार्वजनिक सेवाओं को भी जेंडर के नजरिए देखे जाने की जरूरत है। 

वेबीनार के अंत में यूजीसी की ज्वाइंट सेक्रेटरी डॉ. अर्चना ठाकुर ने यूजीसी की गाइडलाइन्स बात करते हुए कहा कि सरकार देश के विश्वविद्यालयों में चल रहे महिला अध्ययन केंद्रों को लेकर चिंतित है। उन्होंने बताया कि यूजीसी की कई फेलोशिप और स्कॉलरशिप कार्यक्रम विशेष रुप से महिलाओं के लिए संचालित किए जा रहे हैं। उन्होंने सेक्सुअल हैरेसमेंट जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा की साथ ही सक्षम पोर्टल और टोल फ्री नंबर भी साझा किया। वेबीनार में डीन फैकल्टी ऑफ सोशल साइंस प्रोफेसर रविंद्र कुमार और सेंटर के डॉ. फिरदौस अजमत सिद्दीकी, डॉ. मेहर फातिमा हुसैन, डॉ. नबीला सादिक, डॉ सुरैया तबस्सुम, डॉ अदफर रशीद शाह, डॉ. तरन्नुम सिद्दीकी, अपर्णा दीक्षित, आफरीन हुसैन, श्रीकुमार, उदय रवि, रुकमणी मोंगा, दिव्या मिश्रा, माहेरा, विशाखा, अकील हुसैन, सिराज खान, फरहीन जेहरा और राफिया सहित देश के दूरस्थ इलाकों के शिक्षक और छात्र भी गूगल मीट के माध्यम से मौजूद रहे।

No comments