उच्च न्यायालय में अधिवक्ताओं की नियुक्ति पर उठे सवाल- सरकारी वकीलों की नियुक्तियां
प्रातःकाल न्यूज नेटवर्क
उच्च न्यायालय में अधिवक्ताओं की नियुक्ति पर उठे सवाल-उच्च न्यायालय में अधिवक्ताओं की नियुक्तियों में जमकर हुई धांधली ...
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में बीएसपी सरकार में लगभग साढ़े चार सौ और सपा में साढ़े पांच सौ के लगभग सरकारी वकीलों की नियुक्तियां हुई थी.आज भाजपा शासनकाल में ये संख्या बढ़कर साढ़े आठ सौ हो गई है.
पहले एक डेढ़ माह में नियुक्तियां हो जाती थी इस सरकार में पहली सूची पांच माह में आईं.फिर न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद रिव्यू लिस्ट आईं एक लिस्ट आधी अधूरी और विसंगतियों भरा और अंत में आईं एक सूची क्रिमिनल साईड की.
महाधिवक्ता.अपर महाधिवक्ता और सीएससी की नियुक्ति हुई मगर जीए की नियुक्ति सरकार के गठन के साल भर बाद हुई और उस पर भी त्रुटि ये थी कि उनके एडवोकेट आन रोल पर दूसरे का न. दर्ज था.कई अधिवक्ताओं का नाम दो दो जगह.अन्य दलों के लोगों की भरमार है.जो पार्टी अधिवक्ताओं की नाराजगी का भी एक कारण है.अपरिपक्व लोगों को बड़ी जिम्मेदारी मिली.वरिष्ठों को काम ओहदे वाले पद मिले.
इस सभी सूची में संघ से जुड़े लगभग तीन सौ और भाजपा से जुड़े लगभग दो दर्जन अधिवक्ताओं की नियुक्ति हुई ऐसा सूत्रों से पता चला है.
माननीय न्यायाधीशौं ने अपने लोगों की जमकर नियुक्तियां कराई तो न्यायमंत्री और सचिवन्याय ने भी अवसर का जमकर लाभ उठाया.
भाजपा खेमे में संघ के प्रति जबरदस्त रोष है लोगों का कहना है कि बारह महीने विपक्षियों से संघर्ष पार्टी के लोग करें और मलाई मारने संघ के लोग आ जाते हैं.सूत्र बताते हैँ कि संघ के स्थानीय बड़े नेता ने सूची बनाने में बड़ी अनियमितता की और नये नये लोगों के हित लाभ के लिये नई नई शाखायें खोली.इधर 2014 में केंद्र में भाजपानीत सरकार बनने के बाद अधिवक्ताओं का झुकाव स्वार्थवस भाजपा की ओर बढ़ने की जगह संघ की ओर बढ़ा.जिसमें 2017 में प्रदेश सरकार बनते ही अप्रत्याशित वृद्धि हुई.
अधिवक्ताओं की नियुक्तियों में प्रदेश के जिम्मेदार पदाधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप भी गाहे बगाहे चर्चा में रहते हैं.
पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के खिल्ली उडाने के चर्चे उच्च न्यायालय के गलियारों में आम हैँ.
अभी हाल ही में एक अति वरिष्ठ पार्टी अधिवक्ता की आकस्मिक मृत्यु हो गई जिसका एक प्रमुख कारण उनका सरकारी वकील न बनना भी हैँ.महाधिवक्ता द्वारा उनको अपमानित किये जाने की भी चर्चा है.ऐसे अनेक कार्यकर्ता छूटे हैँ जिनकी पहचान ही दो तीन दशकों से भाजपा की है.
स्थानीय संगठन ने भी मूल कार्यकर्ताओं की घोर उपेक्षा करते हुए अपने सम्बन्धियों और चाटुकार लोगों को वरीयता दी है.अनेक वर्तमान और पूर्व प्रमुख पदाधिकारी अभी बाहर हैं.
कुछ भाजपाई और संघ मानसिकता के वकील धरना प्रदर्शन कर विरोध दर्ज कराये जिनका धरना अभी हाल मे प्रभारी मंत्री के आश्वासन पर समाप्त हुआ हैँ.एक और लिस्ट आने की चर्चा है जिसमें पिछड़ों और दलितों को समायोजित करने की बात की जा रही है इस कारण छूटे हुए खांटी भाजपाइयों मे निराशा के भाव उभर रहे हैं.
स्थानीय कार्यकर्ताओं में प्रदेश के एक सर्वाधिक शक्तिशाली महामंत्री.महाधिवक्ता एवं स्थानीय संगठन प्रमुख के प्रति काफी आक्रोश है.जिस पर समय रहते काबू नही किया गया तो आगे लोकसभा चुनाव काफी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता हैँ.
उच्च न्यायालय में अधिवक्ताओं की नियुक्ति पर उठे सवाल-उच्च न्यायालय में अधिवक्ताओं की नियुक्तियों में जमकर हुई धांधली ...
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में बीएसपी सरकार में लगभग साढ़े चार सौ और सपा में साढ़े पांच सौ के लगभग सरकारी वकीलों की नियुक्तियां हुई थी.आज भाजपा शासनकाल में ये संख्या बढ़कर साढ़े आठ सौ हो गई है.
पहले एक डेढ़ माह में नियुक्तियां हो जाती थी इस सरकार में पहली सूची पांच माह में आईं.फिर न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद रिव्यू लिस्ट आईं एक लिस्ट आधी अधूरी और विसंगतियों भरा और अंत में आईं एक सूची क्रिमिनल साईड की.
महाधिवक्ता.अपर महाधिवक्ता और सीएससी की नियुक्ति हुई मगर जीए की नियुक्ति सरकार के गठन के साल भर बाद हुई और उस पर भी त्रुटि ये थी कि उनके एडवोकेट आन रोल पर दूसरे का न. दर्ज था.कई अधिवक्ताओं का नाम दो दो जगह.अन्य दलों के लोगों की भरमार है.जो पार्टी अधिवक्ताओं की नाराजगी का भी एक कारण है.अपरिपक्व लोगों को बड़ी जिम्मेदारी मिली.वरिष्ठों को काम ओहदे वाले पद मिले.
इस सभी सूची में संघ से जुड़े लगभग तीन सौ और भाजपा से जुड़े लगभग दो दर्जन अधिवक्ताओं की नियुक्ति हुई ऐसा सूत्रों से पता चला है.
माननीय न्यायाधीशौं ने अपने लोगों की जमकर नियुक्तियां कराई तो न्यायमंत्री और सचिवन्याय ने भी अवसर का जमकर लाभ उठाया.
भाजपा खेमे में संघ के प्रति जबरदस्त रोष है लोगों का कहना है कि बारह महीने विपक्षियों से संघर्ष पार्टी के लोग करें और मलाई मारने संघ के लोग आ जाते हैं.सूत्र बताते हैँ कि संघ के स्थानीय बड़े नेता ने सूची बनाने में बड़ी अनियमितता की और नये नये लोगों के हित लाभ के लिये नई नई शाखायें खोली.इधर 2014 में केंद्र में भाजपानीत सरकार बनने के बाद अधिवक्ताओं का झुकाव स्वार्थवस भाजपा की ओर बढ़ने की जगह संघ की ओर बढ़ा.जिसमें 2017 में प्रदेश सरकार बनते ही अप्रत्याशित वृद्धि हुई.
अधिवक्ताओं की नियुक्तियों में प्रदेश के जिम्मेदार पदाधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप भी गाहे बगाहे चर्चा में रहते हैं.
पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के खिल्ली उडाने के चर्चे उच्च न्यायालय के गलियारों में आम हैँ.
अभी हाल ही में एक अति वरिष्ठ पार्टी अधिवक्ता की आकस्मिक मृत्यु हो गई जिसका एक प्रमुख कारण उनका सरकारी वकील न बनना भी हैँ.महाधिवक्ता द्वारा उनको अपमानित किये जाने की भी चर्चा है.ऐसे अनेक कार्यकर्ता छूटे हैँ जिनकी पहचान ही दो तीन दशकों से भाजपा की है.
स्थानीय संगठन ने भी मूल कार्यकर्ताओं की घोर उपेक्षा करते हुए अपने सम्बन्धियों और चाटुकार लोगों को वरीयता दी है.अनेक वर्तमान और पूर्व प्रमुख पदाधिकारी अभी बाहर हैं.
कुछ भाजपाई और संघ मानसिकता के वकील धरना प्रदर्शन कर विरोध दर्ज कराये जिनका धरना अभी हाल मे प्रभारी मंत्री के आश्वासन पर समाप्त हुआ हैँ.एक और लिस्ट आने की चर्चा है जिसमें पिछड़ों और दलितों को समायोजित करने की बात की जा रही है इस कारण छूटे हुए खांटी भाजपाइयों मे निराशा के भाव उभर रहे हैं.
स्थानीय कार्यकर्ताओं में प्रदेश के एक सर्वाधिक शक्तिशाली महामंत्री.महाधिवक्ता एवं स्थानीय संगठन प्रमुख के प्रति काफी आक्रोश है.जिस पर समय रहते काबू नही किया गया तो आगे लोकसभा चुनाव काफी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता हैँ.


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