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अमर उजाला जम्मू कश्मीर के संपादक दयासागर शुक्ल की कलम से आज -



Kumbh Mela 2019 : योगी राज में कुंभ में आखिर किन्नर अखाड़ा भी बन गया। ये विचित्र संयोग है कि योगी और किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर दोनो की कर्म भूमि गोरखपुर रही है। कल प्रयागराज में जितनी भव्यता से इनकी देवत्व यात्रा निकली की सब दंग रह गए।  किन्नर घोड़ों और बग्घियों पर सवार थे, जबकि बाकी अखाड़ों की यात्रा में ट्रैक्टर ट्रॉली पर रखे सोने-चांदी के हौदों पर साधु-संत विराजमान थे। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस देवत्व यात्रा में 25 से अधिक बग्घियां थीं। किन्नर अखाड़े की इस देवत्व यात्रा में सबसे आगे आठ बग्घियों पर अखाड़े के संत विराजमान थे और इसके पीछे अखाड़े की महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ऊंट पर सवार थीं और लोगों को आशीर्वाद दे रही थीं। इनके पीछे एक वाहन में अखाड़े के आराध्य देवता महाकालेश्वर विराजमान थे।
देवत्व यात्रा में आराध्य देवता के पीछे बाजे-गाजे और झांकियों के साथ बग्घियों पर किन्नर साधु संत सवार थे और लोगों को आशीर्वाद दे रहे थे। किन्नर संतों ने सुंदर साड़ियां पहन रखी थीं और खूब श्रृंगार कर रखा था जिससे उनकी यह यात्रा एक अलग ही छठा बिखेर रही थी।
ये महामंडलेश्वर वही हैं जिन्हें आपने बिगबॉस के सीजन 5 में देखा होगा। कई अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में ये मुझसे मिल चुकी हैं। आज अपने  अखबार में इनकी भव्य तस्वीर देखी तो अकेले बैठे ही चेहरे पर मुस्कान आ गई। सदियों से चले आ रहे कुम्भ में पहली बार किन्नरों के अखाड़ा भी शामिल हो गया। ये एक नई परंपरा की शुरुआत है जिसके लिये पंडित त्रिपाठी बधाई के पात्र हैं।
इलाहाबाद रहते 2012 के महाकुंभ को मैंने करीब से जाना समझा। जिस महाकुंभ में कभी शंकराचार्य और मंडन मिश्र जैसे विद्वानों के बीच शास्त्रार्थ हुआ करते थे वहां अब राधे मां, गोल्डन बाबा जैसे धूर्त बाबाओं का जमघट लगने लगा है। हिन्दू धर्म का पतन देखना हो तो एक बार कुंभ जरूर आइये। गरीबों से लूट खसोट और आस्था के नाम पर धार्मिक भावनाओं को जो खिलवाड़ आपको यहाँ दिखेगा और कही नहीं । कुम्भ में पाखण्डियों में भरमार है तो अगर इसमें शिखण्डी में शामिल ही जाएं तो क्या गलत है। हालांकि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने किन्नर अखाड़ा को मान्यता नहीं दी है। लेकिन उनकी मान्यता का कोई फर्क नही पड़ता। कल प्रयाग में सड़क के दोनों ओर सैकड़ों की संख्या में लोगों ने किन्नर संन्यासियों का फूल-मालाओं से स्वागत किया। रथ व ऊंटों पर बैठे किन्नर संन्यासियों की शोभा निराली थी। बताते हैं इस अखाड़े के  भव्य जुलूस ने साधु संतों के जुलूसों के रंग को फीका कर दिया। मुझे किसी रिपोर्टर ने बताया कि ऐसा भव्य जुलूस कुंभ में पिछले सौ साल में नही निकला।
कहानी है कि जब श्रीराम 14 वर्ष के वनवास पर जा रहे थे तब उनकी प्रज्ञा और  किन्नर समुदाय उनके पीछे-पीछे चलने लगे थे। श्रीराम ने उन सभी को वापस जाने के लिए कहा। 14 वर्ष बाद जब श्री राम वनवास से वापस आए तो बाकी सब तो चले गए थे लेकिन किन्नर वहीं उनका इंतजार कर रहे थे। भगवान राम ने उन्हें वरदान दिया था कि उनका आशीर्वाद हमेशा फलेगा। तभी से ये मांगलिक कार्यों और बच्चों के जन्म और विवाह आदि मांगलिक कार्यों में लोगों का आशीर्वाद देते हैं। हमारे हिन्दू धर्म मे साधु संतों का काम भी आशीर्वाद देना है। इस लिहाज से त्रिपाठी जी ने अपना अलग अखाड़ा बना लिया तो ठीक ही किया। सड़क पर ताली बजा कर भीख मांगने वाले किन्नरों को अब एक नया धंधा मिल गया है। हमारे कथित मंडेश्वर महा मंडेश्वरो को बेशक चिंतित होने की जरूरत है। आज नही तो कल इस किन्नर अखाड़े को भी धार्मिक मान्यता मिल जाएगी। यही हिन्दू धर्म का लचीलापन है। लोगो की यादाश्त बहुत छोटी होती है। आज से सौ साल बाद कुंभ नहाने वाली पीढ़ी कहेगी कि किन्नरों की शोभायात्रा आदिकाल से चली आ रही है। ये कुंभ और हिन्दू धर्म की प्राचीन परंपरा है। परम्पराएं ऐसी ही बनती बिगड़ती हैं।इसलिये परम्परा को लेकर हाय तौबा मचाना जहालत है और कुछ नहीं।

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