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धूमधाम से मनायी गई जश्न-ए-ईद मिलादुन्नबी, फ़रिश्ते के द्वारा, मुहम्मद साहब को......पढें

 प्रतापगढ़। आज जश्ने ईद मिलादुन्नबी बडी शानोंशौकत से मनाया गया। इस अवसर पर मस्जिदों से लेकर घर मोहल्ले व प्रमुख मार्गों पर रोशनी की गई। मदनसा इस्लामियां गुलशने बगदाद शाहपुर रानींगज प्रतापगढ की जानिब से जुलूस ए मोहम्मदी का आयोजन हुआ और मस्जिदों में मिलाद शरीफ हुई। इस्लामिक धर्मगुरु ने कुरान शरीफ का केरात किया और मस्जिदों से बच्चों का जुलूस निकाला गया, जो विभिन्न मार्गो से होते हुए शहीद शाह कुतुब उद्दीन रहमतुल्लाहि अलैहि की मजार शरीफ पर फातेहा नियाज हुई मिठाई बांटी गयी । जश्ने ईद  मिलादुन्नबी पर सभी मस्जिदों में मिलाद शरीफ के आयोजन हुए। लाइट की आकर्षक झालरों से सजावट करने के साथ लंगर बांटे गए। 
 विभिन्न कमेटियों ने अपने अपने मोहल्ले से जुलूस ए मोहम्मदी का आयोजन किया। सभी जुलूस कई मुहल्लों तक पहुंचे। वहां से कदीमी रास्ते तय करते हुए शहीद शाह कुतुब उद्दीन रहमतुल्लाहि अलैहि के दरगाह पहुचा। गौरतलब हो कि इस्लाम के पैकर पैगम्बर हजरत मोहम्मद ए मुस्तफा की जन्म तिथि पर खुशियां मनाई गई। इंसानियत का पैगाम देने वाले मोहम्मद साहब के किस्से बताए गए। इस अवसर पर तहसील रानीगंज प्रतापगढ़ के सीओ, एसडीएम, इंस्पेक्टर सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। 
बतादें कि मुहम्मद(محمد صلی اللہ علیہ و آلہ و سلم)[n 1] ( अरबी : محمد ; उच्चारण [mūħammad] ; [n 2] 570 ई - 8 जून 632 ई) [1] इस्लाम के संस्थापक थे। [2] इस्लामिक मान्यता के अनुसार, वह एक भविष्यवक्ता और ईश्वर का संदेशवाहक थे, जिन्हें इस्लाम के पैगंबर भी कहते हैं, जो पहले आदम , इब्राहीम , मूसा ईसा (येशू) और अन्य भविष्यवक्ताओं द्वारा प्रचारित एकेश्वरवादी शिक्षाओं को प्रस्तुत करने और पुष्टि करने के लिए भेजे गए थे। इस्लाम की सभी मुख्य शाखाओं में उन्हें अल्लाह के अंतिम भविष्यद्वक्ता के रूप में देखा जाता है, हालांकि कुछ आधुनिक संप्रदाय इस विश्वास से अलग भी नज़र आते हैं। मुसलमान यह विश्वास रखते हैं कि क़ुरआन जिब्राईल (ईसाईयत में गैब्रियल) नामक एक फ़रिश्ते के द्वारा, मुहम्मद साहब को ७वीं सदी के अरब में, लगभग ४० साल में याद-कंठस्‍थ कराया गया था। मुहम्मद साहब, विश्वासियों को एकजुट करने में एक मुस्लिम राजनीति स्थापित करने में, एक साथ इस्लामिक धार्मिक विश्वास के आधार पर कुरान के साथ-साथ उनकी शिक्षाओं और प्रथाओं के साथ नज़र आते हैं।
लगभग 570 ई (आम-अल-फ़ील (हाथी का वर्ष)) में अरब के शहर मक्का में पैदा हुए, मुहम्मद साहब छह साल की उम्र में अनाथ हो गये । वह अपने पैतृक चाचा अबू तालिब और अबू तालिब की पत्नी फ़ातिमा बिन्त असद की देखभाल में थे। समय-समय पर, वह प्रार्थना के लिए कई रातों के लिए हिरा नाम की पर्वत गुफा में अल्लाह की याद में बैठते । बाद में, 40 साल की उम्र में, उन्होंने गुफा में जिब्रील अलै. को देखा, जहां उन्होंने कहा कि उन्हें अल्लाह से अपना पहला प्रकाशन प्राप्त हुआ। तीन साल बाद, 610 में, हज़रत मुहम्मद साहब ने सार्वजनिक रूप से इन रहस्योद्घाटनों का प्रचार करना शुरू किया, यह घोषणा करते हुए कि " ईश्वर एक है ", कि अल्लाह को पूर्ण "समर्पण" (इस्लाम), कार्यवाही का सही तरीका है (दीन),और वह इस्लाम के अन्य भविष्यवक्ताओं के समान, भगवान के एक पैगंबर और दूत थे।

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