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यूपी पंचायत चुनाव :कई गांव का आरक्षण तय करने में पेच. 755 ग्राम पंचायतों के आंशिक विभाजन पर विवाद


प्रातःकाल एक्सप्रेस ब्यूरो लखनऊ। प्रदेश की 755 ग्राम पंचायतों को आंशिक रूप से शहरी क्षेत्र में शामिल किए जाने पर विवाद पैदा हो गया है। इनमें राजस्व गांव तोड़े गए हैं।  आशंका जताई जा रही है कि इस वजह से आगामी पंचायत चुनाव के लिए तय होने वाला आरक्षण बाधित हो सकता है। इन ग्राम पंचायतों में राजस्व गांवों के दो हिस्से हो गए हैं। एक हिस्सा शहरी क्षेत्र में चला गया है और दूसरा ग्रामीण क्षेत्र में।

इस संबंध में पंचायतीराज विभाग के अपर मुख्य सचिव मनोज सिंह की ओर से एक शासनादेश जारी किया गया है। इसमें कहा गया है कि नगर विकास विभाग की अधिसूचनाओं के अनुसार जहां राजस्व ग्राम की आबादी शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में विभाजित हुई है, वहां शेष ग्रामीण आबादी का श्रेणीवार (एससी-एसटी-ओबीसी ) का वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार निर्धारण जिला स्तरीय समिति द्वारा किया जाएगा। इस कार्य के लिए उक्त समिति में संबंधित जिलाधिकारी और अधिशासी अधिकारी को समिति का विशेष आमंत्रित सदस्य बनाया जाएगा। समिति का निर्णय अंतिम होगा।

राष्ट्रीय पंचायतीराज ग्राम प्रधान संगठन ने पंचायतीराज विभाग के अपर मुख्य सचिव के आदेश पर एतराज उठाया है। संगठन के प्रवक्ता ललित शर्मा का कहना है कि राजस्व गांव को तोड़ना नियम विरुद्ध है, आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने मांग की है कि जो राजस्व गांव आंशिक रूप से प्रभावित हुए हैं, उन्हें या तो पूरी तरह ग्रामीण क्षेत्र में शामिल किया जाए या फिर शहरी क्षेत्र में। एक ग्राम पंचायत में एक या इससे अधिक राजस्व गांव हो सकते हैं। श्री शर्मा ने कहा कि अगर प्रदेश सरकार ने उनकी मांग नहीं मानी तो वह इस मामले को अदालत में ले जाएंगे।


ग्राम प्रधान संगठन 25 दिसम्बर को ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने पर मौजूदा ग्राम प्रधानों की अध्यक्षता में ही प्रशासनिक समिति गठित किए जाने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल कर चुका है।  याचिका में कहा गया है कि जब तक प्रदेश में पंचायत चुनाव नहीं होते तब तक ग्राम पंचायतों के विकास कार्य बजाए एडीओ पंचायत जैसे सरकारी अधिकारी को प्रशासक बनाकर करवाने के, मौजूदा ग्राम प्रधानों की ही अध्यक्षता में प्रशासकीय समिति बनवाकर करवाए जाएं।

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