स्वदेशी से स्वावलंबन के लिए नजरिया बदलने की जरूरत- आयुष मिश्रा
आत्मनिर्भर से स्वावलंबन के सफर में छोटे उद्योगों की बहुत अहम हो जाती है तब जब बात गांव की जरूरतें गांव से ही पूरे करने की हो । महान विचारक और दार्शनिक महात्मा गांधी के ग्रामोदय दर्शन को विचारों से अलग वास्तविकता में अमल के आज के इन दिनों में सही और सार्थक प्रतीत होता है।
छोटे और लघु उद्योग से ना केवल आज की डामाडोल हो चुकी अर्थव्यवस्था की दशा सुधरेगी बल्कि बड़े पैमाने पर पलायन, रोजगार सहित कई ऐसी पीड़ा दाई समस्या का अंत भी करेंगे जो मनुष्य होने के लिए मनुष्य के लिए जरूरी है लेकिन जरूरत है उस छोटे और लघु उद्योग से उत्पादित सामान के बाजार की ऐसे में वैश्वीकरण से बदल चुका लोगों का विचार और नजरिया देश में ही बन रही चीजों के उपयोग पर देखने योग्य होगा । ब्रांड और विदेशी साजो सामान से सुसज्जित शहरों की बड़ी-बड़ी मार्केट आज अधिकांश भारतीय आबादी को आकर्षित करती है ऐसे में क्या यह हो पाएगा की छोटे उद्योग से उत्पादक वस्तु को उचित दाम और खरीदार मिल सके? बदल चुके वैचारिक पराकाष्ठा और विज्ञापन के दौर में एक चिंता का विषय है ऐसे में भारतीय लोगों को स्वदेशी , स्वावलंबन जैसे शब्दों का सही ज्ञान देश के स्थिरता के लिए जरूरी है जो गांधी जी के द्वारा आजादी के समय भी भारत के आत्मनिर्भर होने के लिए सही और प्रयुक्त था और आज भी कोरोना से जंग के बाद भी ।
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| लेखक,विचारक आयुष मिश्रा |
- यदि सभी यही मान ले कि भारत में बनी वस्तु का ही विनिमय करना है तो दिख रही विकराल स्थिति अर्थव्यवस्था की दृष्टि से काफी आसान और सरल हो जाएगी बस जरूरत है ब्रांड और बड़ी विदेशी कंपनियों से ध्यान और विचार हटाकर देश में निर्मित समान और चीजों पर ध्यान केंद्रित और उपयोग करने का, मुश्किल जरूर है यह लेकिन असंभव नहीं और राष्ट्र के दृष्टिकोण से तो बहुत ही हितकारी या यू कहे तो संकट मोचन के समान है।



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