बिहार विधानसभा चुनाव में मुसलमानों के वोट बैंक पर सभी पार्टियों की निगाहें टिकी
बिहार में चुनाव नज़दीक है, सभी पार्टी अपने अपने हिसाब से राजनीतिक गोटियां सेट करने में लगी है, ये बात चुनावी भाषण में कहीं जाती है 'जाति और धर्म पर वोट नहीं दीजिए', लेकिन हकीकत कुछ और है। राजनीति में हिस्सेदारी जरूरी है और इसकी शुरुआत मंडल कमीशन के वक्त हो गई थी, जब लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, बहन कुमारी मायावती, नीतीश कुमार, राम विलास पासवान,जैसे कई पिछड़े वर्ग के नेता आगे आए और अपने समाज और जाति के लोगों को हक दिलाने और उनको सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत करने की बात करके इतने बड़े नेता बने।
अब बात मुसलमानों की, आज़ादी के समय मुसलमानों की सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक स्थिति काफी बेहतर थी, इसलिए मुसलामनों को कभी अपने नेता के होने की जरूरत महसूस नहीं हुई, कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में जिला स्तर पर कुछ नाम पैदा हुए और उनको राजनीतिक दलों में थोड़ा बहुत स्वाद अनुसार जगह और पद दे दिया गया, ना मुसलमानों ने खुद को सरकारी नौकरियों में जाने की चाहत दिखाई और ना पढ़ाई में कुछ रुचि रखने की कोशिश की, और इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा और
धीरे धीरे उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति नीचे आती गई और आज की तारीख में दलितों से अधिक बुरे हालातों में पहुंच गए।
समय समय पर दंगों के कारण आर्थिक विकास कमज़ोर पड़ता गया और इस तरह इनकी नस्लें बर्बाद होती गई।
आज ना शिक्षा है, ना रोजगार है, और ना ही समाज में कोई स्थान है। हालत बद से बद्तर होते जा रहे हैं।
साल 2019-20 में एक बदलाव आया जिसका अंदाज़ा शायद किसी भी राजनीतिक दलों को और या यूं कहें किसी को नहीं था, ट्रिपल तलाक़ बिल पर चर्चा के दौरान मुसलमानों ने कुछ नहीं कहा, कुछ राजनीतिक भाषणबाजी हुई, मुसलमान फिर भी चुप रहें मामला आया और गया, फिर बाबरी मस्जिद पर भी फैसला मुसलमानों के पक्ष में नहीं आया और फिर मुसलमान चुप रहें क्योंकि कोई रहनुमा तो है ही नहीं बोलने के लिए इसी तरह से केंद्र सरकार एक बिल लाई नागरिकता अधिकार अधिनियम बिल।
अब मामला नागरिकता को साबित करने की थी। इस बीच देश के बड़े विश्वविद्यालयों में और जगह जगह इस विषय पर चर्चा होना शुरू हुआ जोआहिस्ता, आहिस्ता आंदोलन का रुप लेता गया।
इस देश के मुसलमानों और अमन पसंद लोगों ने सड़कों को अपना आशियाना बनाना शुरू कर दिया और देखते ही देखते पूरे देश में नागरिकता अधिकार अधिनियम बिल के खिलाफ आवाजें बुलंद होने लगी।
हर आंदोलन का स्वाभाविक रूप से कोई रहनुमा होता है, परन्तु इसका कोई रहनुमा स्पष्ट रूप से कोई नहीं था।
हर जगह मौजूद जानता ही इसको लीड करती नजर आने लगी। शायद यही वजह थी कि इस आंदोलन को कोई खरीद नहीं सका।
इस आंदोलन ने देश और दुनिया में सबको हिला कर रख दिया
आमतौर से मुसलमान और खास तौर से मुस्लिम औरतें कभी सड़कों पर आंदोलन करते नज़र नहीं आती परन्तु
मुसलम समुदाय की औरतों ने इस मुद्दे को गंभीरता से समझने की कोशिश की और सबसे आगे बढ़ करके इस बिल का विरोध किया।
अलग अलग धर्मों के
सामाजिक दूरी को कम करने में भी इस आंदोलन में मदद की।
अभी इस बिल का विरोध कम नहीं हुआ था कि कोरोनावायरस महामारी आ गई और आम लोगों ने महामारी ना फैले इसलिए लगभग 100 दिनों से अधिक चले इस आंदोलन को वापस लिया ।
कोविड-१९ कै कारण देश लगभग 70 दिनों तक लॉकडॉउन में चला गया और इसका सबसे ज्यादा नुकसान गरीब अप्रवासी मजदूरों को हुआ।
इस बुरे वक्त में उनकी मदद करते सड़कों पर दिखे मुस्लिम समुदाय के लोग और ये बात समझ में आने लगी कि मुस्लिम समुदाय अब जागरूक होना शुरू हो चुका है और अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को निभा रहा है।
नागरिकता अधिकार आंदोलन ने खास तौर पर मुस्लिम समुदाय के लोगों को जागरूक किया है। इसी का परिणाम था कि संकट कि इस घड़ी में मुस्लिम समुदाय के लोग दुसरों की मदद करने के लिए दिन रात मेहनत करते दिखें।
देश में मसलमनों को ये बात समझ में आ गई की घरों से बाहर निकलना होगा, समाज में हिस्सेदारी की बात करनी होगी।
नागरिकता अधिकार अधिनियम बिल आंदोलन के बाद पहला चुनाव बिहार विधानसभा का चुनाव है जिसमें मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा वोट बैंक है और अब मुसलमान अपने हिस्सेदारी की बात करता भी नजर आ रहा है उन्हें ये समझ में आ गया है कि अपने हक के लिए खुद लड़ना होगा। पूरी दुनिया ने देखा कि मुस्लिम एवं दुसरे लोग अपने मुद्दों पर कैसे एक बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकते है।
इसलिए मेरी सभी राजनीतिक दलों से खास करके वो पार्टी जो खुद को सभी धर्म और जाति या यूं कहें कि मुसलमानों के वोट का हकदार समझती है, को मुसलमानो को किसी झुठे सपने ना दिखाएं बल्कि उनके भागिदारी का ध्यान रखें।
अगर वो पार्टी राजनीतिक हिस्सेदारी देने में हमेशा की तरह चुकी तो मामला खराब हो सकता है।
राजनीतिक हक और हिस्सेदारी देने की बात करनी होगी वरना अब मुसलमानों का वोट बड़े आराम से नहीं मिलने वाला है। नई राजनीतिक स्थिति पैदा हो चुकी है, हक और हिस्सेदारी की बात होनी शुरू हो गई है। इसलिए राजनीतिक गोटियां को सही सेट करने में जिसने चूक की उसको परेशान होना पड़ेगा।
*लारैब अहमद नियाज़ी*
छात्र जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली


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