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क्या धूमिल होते जा रहे हैं मार्टिन लूथर के रंग भेद मिटाने के लिए किए गए प्रयास- आयुष मिश्रा

हाल ही में हुए अमेरिकी पुलिस द्वारा अफ्रीकी -अमेरिकी नागरिक जॉर्ज फ्लोएड की निर्मम हत्या ने रंगभेद की अ्धबुझी चिंगारी को और धधका  दिया है जिसका शोला अब पूरे अमेरिका में फैल गया है, अमेरिका में नस्लभेद और नीगोराईड रेस से सौतेला पन का सिलसिला सदियों पुराना है।

इसी रंगभेद और नागरिक समान अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए मार्टिन लूथर किंग जैसे योद्धा ने विश्व पटल पर अपनी अलग पहचान बनाई और सन 1964 में नोबल जैसे प्रतिष्ठित पदक से अलंकृत हुए। आज अपना और अपनों तक समझ चुके समाज में रंगभेद जैसे मुद्दे बन्ना और निर्मम हत्या होना दुखदाई विषय है ऐसे में यही प्रतीत होता है कि कहीं ना कहीं मोहम्मद अली, रोजा पार्क्स, जॉन लुईस, मार्टिन लूथर जैसे अनेक महान विभूतियों की लड़ाई और स्वात्याग भी इस दुनिया में मानवता की अलख जलाने के लिए कमतर था। 
महज $20 के लिए हुई जॉर्ज फ्लोएड की हत्या आज इन सभी बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करवाती हैं, जॉर्ज फ्लोएड के शब्द"मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं" नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं के लिए आंदोलन खड़ा करने का प्रमुख जरिया बना, सन 2014 में भी ऐसी ही हत्या ने अमेरिका को अपने निर्ममता पर शर्मसार करवाया था उस समय भी मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं शब्द लोगों के कान में गूंज रहे थे। अमेरिका जैसे विकसित देश में रंग के आधार पर भेदभाव ने मनुष्यता पर भी सवालिया निशान खड़ा किया है और जब बर्बरता पुलिसिया कार्यवाही से हो तो यह सवालिया धीरा पूरे सिस्टम को मार्क करता है, ऐसे में हमें अपने सिर्फ या प्रश्न पूछ लेना चाहिए कि क्या किसी देश में मनुष्यता और मानवता का स्तर इतना गिर सकता है कि मात्र रंग काला होने से बर्बरता पूर्ण हत्या हो जाए? वह भी आज के ग्लोबलाइज्ड दुनिया में।

1 comment:

  1. This is completely inhumane happening in America. . We should not differenciate anybody on the basis of colour..

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