क्या कभी चीन का बहिष्कार हो सकता है? - रुक्मनी मोंगा
वो जो यह समझ रहें है कि चीन, कभी लाचार, या बेबस होने की श्रमता प्रदान करता है, असल में यह भूल रहे हैं की जो आज, अभी हो रहा है, आस पास जो भी है, या तक की यह आवाज़ जो लड़ना चाह रही है और कहती है की उनकी अर्थव्यवस्था गिरा देगी, खुद आज मजबूर है, उनके इशारों और शक्ति पर, उनके हाल पर। यह जंग सिर्फ़ आबादी की नहीं, शौहरत और जसबे की भी है, जो हारने नहीं देती, यह जंग आपसी मुक़ाबलों में सीमित नहीं, पर एक आवाज़ जो चीखकर अपनी जगह खोदना चाहती है, फिर चाहे वो लाइन ओफ़ ऐक्चूअल कंट्रोल हो या वो यूएस के हिस्से में जी डी पी ही क्यूँ न हो ।
घर बैठे बैठे,अपनी इज़्ज़त बचाते हुए कहते हैं की “चीन को नहीं छोड़ेंगे”, अच्छा तो यह फ़ोन भी छोड़िए, इस फ़ोन में लगा पिन भी छोड़िए, और इस पिन से जुड़ी तिजोरी, इस तिजोरी में दुनिया की तमाम उलझी बातें और कारनामें भी छोड़िए, और छोड़िए वो क़ाबिलियत जो आज दूसरे को नीचा दिखाती है । आर्मी तो सच, और सरकार भी शायद आगे समझे, पर ज़रूरी है हमारा जानना की मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना । इससे पहले कि हम हद्दें तोड़ने का सोचे, आसान होगा उनके परिणामों का सोचें, और एक बेहतरीन समाज को लालच के धुएँ में न उड़ाकर भारती व्यापार को बचाएँ ।
रुक्मनी मोंगा
रीसर्च स्कालर, जामिया मिलिया इस्लामिया


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